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वेलो की घूमती बातें|

कुछ तो लोग लिखेंगे|

मेरी Diary का पहला पन्ना

2017-03

SHORT STORY

 

 

चार कदम ही तो चला था वो उस दिन, पलटा फिर चकित नज़रो से मेरी तरफ देखा। मैंने भी मुस्कुराते हुए उसकी देखा था। मुझे याद हैं वो पल जब उसने अपनी नयी शुरुआत की थी।  मुझे याद हैं, मेरे लिए उस दिन में कुछ नया नहीं था, पर उसके लिए उसके स्कूल का वो पहला दिन था। पहली बार वो नए लोगो के साथ रहने वाला था। आने वाली ज़िन्दगी का उसको अंदाज़ा नहीं था। मुझे पता था अंदर सारे उसके जैसे ही तो होंगे। उनका पहला दिन  हो सकता हैं कुछ रोज़ पहले रहा होगा। 

वो पलट कर देखते देखते अचानक पूरा पलटा,  फिर दौड़ कर आया और मेरी और लपका। मैं तो थोड़ा झुका ही था और अगले ही पल वो मेरी गोद में था। डर लग रहा था उसे  जाने से और उसके एहसास से मैं जुदा नहीं था। 
आखिर उसकी नयी शुरुआत का ये पहला कदम था। 
उसको नीचे रख कर उसके हाथ में अपनी ऊँगली पकड़ाकर मैं चलने लगा। कुछ आगे चला फिर झुका और उसके आंसू पोछने लगा। याद हैं मुझे की मैंने उससे कहा था की बेशक तुम चलना जानते हो लेकिन अपने पैरों पे खड़े होने का ये पहला सबक हैं दूर जाना पड़ता हैं कुछ पल के लिए, कुछ नया सीखना पड़ता हैं। ये ज़िन्दगी का नियम हैं बेटा, दुनिया में सबको अपने पैरों पे खड़ा होना पड़ता हैं। ये तो मुझे नहीं पता की उसको कितना समझ आया और कितना नहीं। अंदर घुसते ही एक अध्यापिका उसकी और आई, वो सहम गया और मेरा पैर पकड़ लिया. उससे एक गुड्डा दिखाया और प्यार  से अपनी और बुलाया। मैंने भी उसकी पीठ पर हाथ रखा और उसी जाने का इशारा किय। 

शायद मेरी पहले की बात का, या शायद इसी लम्हे के एहसास का वो मतलब समझ गया। कुछ तो ज़रूर था जो सोचकर वो आगे चला गया। मैं वही रुका उस दिन की कही वो रो न पड़े। मैं ही तो था उसकी ज़िन्दगी, वो बिन माँ की औलाद था। मुझे एक बार बुलाया था दूर से दिखाया था।  वो दुसरे बच्चों से घुलमे मिलने लगा था ।  वो हर गुज़रते लम्हे के साथ फूल की तरह खिलने तो लगा था।  वो मेरी ज़िन्दगी था, जब से वो मेरे हाथ में आया था, वक़्त हवा की तरह बहता चला था। सब भूल गया था मैं ज़िन्दगी के बारे में, तब से वही तो मेरी ज़िन्दगी था । 

ज़िन्दगी में आते हैं पहले दिन ये कई बार। एक और दिन  ऐसे ही यहाँ छोड़ गया था। वो दिन मेरी ज़िन्दगी का पहला दिन था।  मेरा नया सफर ऐसा उसने मुझे कहा था। मेरा हाथ उसके हाथ में थमाया और मैं चलने लगा। थोड़ी आगे जाकर मैं पलटा था। वो  घुमा हुआ था चेहरा घुमा कर, चश्मा लगा कर गाडी में बैठा और फर्राटे से उड़द गया था। आंसू में आँखों में था तो सही पर वो मेरे होंठों पे आकर ग़ुम हो गया था । 

अब महीने में एक बार फ़ोन आता हैं। मैं अगर बाहर गया हूँ तो दोबारा बात करने में अर्सा गुज़र जाता हैं 

ज़िन्दगी के ये तमाम दिन मेरे पहले थे, और ये मेरी Diary का पहला पन्ना था। 

 

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