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एक विरासत - पगड़ी

2017-05

एक विरासत - पगड़ी

भारतीय जन मानस में पगड़ी जाने कब, क्यों और कैसे धारक के प्रतिष्ठा का प्रतीक बन जाती है। अपनी इज़्ज़त को वह उससे और उसकी बेइज्जती को अपने आप से जोड़ देता है। निर्जीव कपड़े से बनी अपनी जगह के नाते सिर का प्रतीक बन जाती है। ध्यान आयीं महापुरुषों द्वारा धारण की जाने वाली पगड़ी, देश के विभिन्न राज्यों में धारण की जाने वाली पगड़ी, समाज के विभिन्न वर्गों और संतों द्वारा धारण की जाने वाली पगड़ी, हमारे उत्सव और शादियों में प्रयोग होती पगड़ी और समय - समय पर उनका स्थान लेती टोपी। कुछ व्यक्तिगत होती हैं, कुछ समाज विशेष का प्रतिनिधित्व करती, तो कुछ राजनीतिक दलों से जुड़ाव बताती। गुरु गोविंद सिंह द्वारा दी पगड़ी पहनने वाले गुरु की सेना बन गए। गांधी की टोपी राष्ट्रीय आंदोलन में प्रतीक रही। अन्ना की टोपी बदलाव की आहट लेकर आयी। जहाँ कहीं इनका प्रयोग शुचिता के साथ नहीं हुआ, इनका महत्व और धारक की इज्जत दोनों की जिंदगी कम रही। आदमी अपनी पगड़ी की बेइज्जती पर मरने मारने को तैयार हो जाता है। कहीं झुकना हो तो पगड़ी का प्रयोग सिर झुकने जैसा है। माननीय व्यक्ति को पगड़ी पहनाना उसे अपना बनाने जैसा है। 
इस विरासत से हमारे जन जीवन का इतना गहरा रिश्ता है तो इसका प्रयोग राष्ट्रीय प्रतीक की तरह क्यों नहीं? एक तरह की टोपी या पगड़ी धारक की पहचान भारतीय क्यों नहीं ? इसकी अनिवार्यता क्यों न हो ? इसकी शुचिता के मूलभूत सिद्धांत क्यों न हो ? इसकी शुचिता, पवित्रता, उद्देश्य बचपन से क्यों न सिखाये जाये? विरासतों का प्रयोग राष्ट्रीय भावना संप्रेषण के लिए क्यों न हो? राष्ट्रीय स्तर पर जनमानस के जीवन में पगड़ी की प्रतिबद्धता का राष्ट्र हित में प्रयोग क्यों न हो ?

  


 

 

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