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गाँव को गाँव रहने दें।

2017-03

POETRY

इस शहरीकरण की बीमारी ने सबको मारा है। 

अब आपसे बस इतना सा सरोकार हमारा है। 

इसको रोको, और मत बदलो, इसको ऐसा ही रहने दो। 

शहर मत बनाओ, गाँव को गाँव रहने दो।।

 

मैं आशावादी हूँ। एहसास भी है कि आगे की जिंदगी में आशावादी बने रहने का भार संभवत: ज्यादा ही होगा। लेकिन पीछे की जिंदगी की सरसता, सफलता और सुकून हमेशा एक लालच देता है कि काश हम वैसी ही जिंदगी जी पाते, जैसे पहले थे। अब बहुत कुछ बनावटी सा लगता है। जिसे विकास कहकर हम पीछे दौड़ते रहे, वह मृग-मरीचिका मात्र निकली। जमीर भी खोया। जमीन भी खोयी। पानी भी उतरा। आँखों का भी और अन्यथा भी। होश करें तो लगता है कि जैसे बहुत कुछ खोया बिना कुछ पाये।

जमीन का खाद के सहारे अति-दोहन अब हमें जैव-उत्पादों की तरफ खीचता है। खराब पानी और आवोहवा हमें वातावरण संतुलित रखने के आवश्यकता का बोध कराते हैं। गाँव की देशी गाय लुप्त होने के बाद हमें ए-2 दूध की याद आती है। अब जब प्राणों पर बन आई, तब वही पुराने दिन याद आते हैं। क्या हम तब समझदार नहीं थे या अब ज्यादा समझदार हो गए। हमारा मानना है कि हम शिकार हो गये ज्यादा समझदार शिकारियों से। 
गाँव को गाँव की तरह बढ़ाने की पहल नहीं हुयी। वहाँ कोई संसाधन या साधन नहीं बने। किसान व्यापारियों के हांथ कठपुतली बन गया। नकल होती शहरी मानसिकता गाँव पहुँच गई। अब वो रिश्ते, एक दूसरे की मदद में उठते हांथ, समय की गर्त में खो गए। आपसी बंटवारों ने जमींदार को किसान और किसान को मजदूर बना दिया। मुझे भान ही नहीं यह कभी – कभी विश्वास होता है कि आज की तरह संचार के माध्यम अगर पहले गाँव तक होते तो अंग्रेजों को यहाँ से हटा पाना संभव ही न होता। खराब चीज को भी मीडिया ऐसा पेश कर देता है कि जैसे वही सबसे बढ़िया हो। इंटेलेक्चूयल्स का तो कहना ही क्या वे जब चाहे कालीदास से विदयोत्तमा को हरवा दें। 
आज अगर गाँव की चौपाल व्यवस्था और भाईचारा पहले जैसा होता तो नोटबंदी का समाचार सुनकर बोलते की इतना हो-हल्ला हो क्यों रहा है। क्यों कि उन्हें तो बिना रूपये के जीने की आदत थी। एक घर में कमी है तो किसी से लेकर कुछ दिन निकाल लो। फिर सब ठीक हो जाएगा। लेकिन शोर मचा कौन रहा है? ये वो लोग हैं जिनके पास ज्यादा है। अब लेकर कहाँ जाएँ यह समस्या हैं। समस्या शहर की है, जो तय करते हैं कि 32 रूपया दिन में खर्च करने वाला गरीब नहीं होता। वहाँ तो गरीब अब भी नहीं है। वही दिल वाले और अमीर हैं। ये गाँव और गरीब के नाम पर दुहाई देकर छूट लेने की इच्छा रखने वाले जरूर गरीब हैं। गाँव का तो बस इतना ध्यान रखा होता की बीज खाद मुहैया करा देते। वे अपने खेती बाड़ी के काम कर लेते। लेकिन वह नही हुआ समय से। 
अब समय की माँग है कि शहर उनकी क्षतिपूर्ति करे। बैठकर सोचो कि शहरी लोग धनी कैसे हो गए और गाँव के लोग गरीब। उनका ही पैदा किया खाते हुये उनकी तकदीर लिखने की ताकत शहरी लोगों को किसने दी। और यदि आप ने यह भर ओढ़ा है तो बताईए कि किसान के पास उपलब्ध साधन संपन्नता में अपनी जीविका कैसे अर्जित कर पाये। आप जैसी पढ़ाई की व्यवस्था गाँव में कैसे हो। 
कृपा करके गाँव को गाँव रहने दें। उन्हे अच्छी शिक्षा, पीने के पानी, खेल कूद के साधन, बिजली, रोड, स्वास्थ्य सेवाएं , संचार की व्यवस्था करके गाँव में ही उनके उत्पादन को प्रोसेस करने का साधन बना दें ताकि वे अपने उत्पाद का मूल्य खुद तय करें। बाकी सब अपने आप ठीक हो जाएगा।

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