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गरीबी और मजबूरी

2017-06

गरीबी और मजबूरी में पति-पत्नी का वार्तालाप

इमेज सोर्स: पत्रिका न्यूज़| 

करते-करते काम थके, मजदूर हो गये।
टूटा आँखों का सपना, मजबूर हो गये॥
खाद, बीज कुछ काम न आया, मेहनत गयी बेकार।
कर्ज उठाकर पेट को पाला, गया जनम बेगार।
कि तेरा मेरा हर सपना चकनाचूर हो गया,
करते-करते काम थका मजदूर हो गया।


घूम-घूम गोहार लगाई, कहीं नहीं सुनवाई।
सुरसा जैसे मुंह फैलाये, बढ़त जात महंगाई।
दुई जून की रोटी भारी, बेटा-बेटी जनमाये।
इनकी जिन्दगी और फंसी, अब कोई जतन न पाये।
कि तेरा-मेरा हर सपना चकनाचूर हो गया । 
टूटा आँखों का सपना मजबूर हो गया।


बूढ़ा-बूढ़ी बाबू-माई उनकी आँखों का मैं तारा।
उनके पेट भरन में मैं, पाया खुद को बेचारा।
मुन्ना का स्कूल खर्च और बेटी शादी जोग भईल।
खेती लुटते सब बिगड़ल कइसन इ संयोग भईल।
कि तेरा-मेरा सपना चकनाचूर हो गया।
टूटा आँखों का सपना मजबूर हो गया।

हमराह बनी सुगना बोली तुम चाहे जो भी करना।
लेकिन किसी दबाव में आकर आत्म-दाह न करना।
साथ रहे तो पार करेंगे हर मुश्किल जो आये।
एक अकेला थक जाये जो हमराह न साथ निभाए।
मेरे भाग तो तेरे से मजबूत हो गई। 
मुश्किल तो अब जीवन में कबूल हो गई॥

मिल के लड़ेंगे हम दोनों कोई मजबूर न होगा,
मगर अकेले रह पाना हमको मंजूर न होगा।
मेरी भाग भी तेरे संग मजबूत हो गयी,
अब तो मेरी तेरे संग तकदीर हो गयी।

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