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आम आदमी और खास आदमी

2017-05

कविता 

खुदा की खुदाई ये नदिया ये सागर, बाकी सब है गलतफहमी।
सिखाती सभी को प्रकृति आदर, आया कहाँ से ये खास आदमी?

साज-ओ-सामान, ये महल, ये इमारत, सारा यहाँ पर है रब की अमानत।
ख़ुदा भी जगत में जो आयेगा एक दिन, उसको बना देंगे एक आम आदमी।

ये शानो - शौकत, ये दौलत, ये ताकत, बताते है ये जिसे अपना, ये सब है तोहफा उसी का।
जिसकी ये ताकत 'औ' ज़ज़्बा ‌दिलों का, चलाती है कश्ती, ये सब है तोहफा उसी का।

बिजली के घर हों या वितरण प्रणाली, बनाता वही पर रहें हाथ खाली।
जिसका बनाया दे घर घर उजाला, उसके ही घर मनाये अंधेरी दिवाली।

था खाना उगाया जिसमे इन् खास लोगो के लिए, आत्महत्या लिख दी किस्मत में जिसके।
था बनाया जिसने ताज जर्रे-जर्रे से, बनते ही कटे बाजू भी उसके।

 

 

मेहनत से उसकी ही चलते हैं दफ़्तर, चलता सभी कुछ उसके ही बल पर।
खासों के सारे वो नखरे उठाता, खिदमत में उनके जीवन वो गँवाता।

जहाँ भी था जैसे, वो खुश था वहाँ पर, उसे आसमाँ की जरूरत नहीं थी।
था खुद के बल पर ही विश्वास उसका, उसे तो तुम्हारी जरूरत नहीं थी।

नायक अगर आज गाँधी सा होता, सिर वो पकड़कर के अपने रोता।
रोता कि सोचा क्या हो क्या रहा है? अपनों का मारा जहाँ रो रहा है।

एक जात नेता की एक राजवंश है, कहीं कहीं उनमें भी बगुलों में हंस हैं।
उनके अलावा अब एक ही जमात है, उसमें बसे जो सारे आदमी की जात है।

होश संभालो जागो अब नया जमाना आया,

आम आदमी अबतक अपनी करनी पर पछताया।


मिलकर सारे तुम अपनी भी अब एक जात बनाओ,

देश-प्रेम हो धर्म जहाँ पर ऐसा राज बनाओ।

 

 

 

 

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