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एक जंग की असमय मृत्यु

2016-12

संसद का सेशन जिस जंग की भेंट चढ़ा। बुजुर्गों ने रोष भी किया। अनुभवी आँखें सब देखकर दुख मना रहीं थीं। जनता में अच्छे दिन का ख्वाब परवान चढ़ रह था। लोग खुश थे, मदारी के खेल सा खेल भी चल रहा था। लगा था की दिन बहुरेंगे। भारत में सोने की चिड़िया चहकेगी। इस सब के लिए एक करोड़ एक घंटे का नुकसान भी हो जाये तो क्या फर्क पड़ता है। कुल मिलाकर पैसा तो देश में ही है न। लेकिन यह क्या? अगले दिन सब बदल गया। मिलते रहने का निमंत्रण मिला। राजनीतिक दलों को नोट खाते में डालने के रास्ते मिल गए। सब ठीक हो गया। जनता का क्या? आखिर दलों का पैसा भी तो जनता का ही है और उनको ही जाना है तो उसे काला क्यों कहना? कुछ लोगों के पास जो गुप्त धन भी है, उसे कुछ टैक्स देकर नाम बचा सकते हैं। नाम भी गुप्त रहेगा। आखिर जो इतने कष्ट से कमाया है, उसका नाम उजागर करना तो ठीक नहीं। जनता तो जनार्दन है। साक्षात शिव का अवतार है। उसे तो विष ही चाहिए। उसे अमृत मिले तो जाने क्या अनर्थ हो जाये। भरत-भूमि से गलत उदाहरण तो नहीं दे सकते। 
अब नोटबंदी का अर्थ समझ से परे हो गया। जो महीने भर से भोपू बजा रहे थे, की चोर पकड़े जायेंगे, आतंकवाद समाप्त हो जाएगा, राजनीतिक दल भी साफ सुथरी कवायद करेंगे, उनको कितना धक्का लगेगा पता नहीं। शायद न भी लगे क्योंकि वे तो सिर्फ भोपू हैं। 
मुझे तो अब विश्वास सा होने लगा की चुनावों से पहले यह जनता के लिए वार्म-अप एक्सर्साइज़ थी। यह देखना था कि कौन सा नारा अभी मंजूर है। वह हो गई। जिसे जो मंत्र मिला उसपर काम करेगा। हाँ सरकारी मोहकमों को कुछ काम भी मिल गया। कुछ विरोधियों के ऊपर केस बनेंगे। अगर उन्हें कुछ सीटें चुनाव में मिल गईं और उनकी जरूरत पड़ी तो मुश्किल मे काम आएँगे। 
अच्छा ही हुआ। जंग जो मृत्यु का पर्याय होती, उसकी ही मौत हो गई।

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