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वेलो की घूमती बातें|

कुछ तो लोग लिखेंगे|

नोटबंदी एक जंग है, उत्सव नहीं।

2016-12

यह एक जंग ही तो है कालाबाजारी रोकने की कोशिश में। जितने भी लोग इस काम में लगे हैं, दुश्मन बन जाते हैं। दुष्ट मन के लोग जब दुश्मन हों, तो बहुत खतरनाक हो जाते हैं। दिखाई भी पड़ रहा है कि संस्थान जो कर रहा है, उसे फेल करने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। काला-बाजारी से पैदा पैसा हर गलत काम करने वालों को एकजुट कर देता हैं। उतनी एक जुटता ईमानदारी से जीवन जीते लोगों में नहीं आती। वे अपने रोज- रोज के काम में लगे हुये तटस्थ रहकर सफलता के लिए दुआ करते रहते हैं। अब नेट के जमाने में सारा ज़ोर लिखने में लगा देते हैं हैं, सामाजिक माध्यमों में और लिखकर संतुष्ट हो जाते हैं।
नोट-बंदी को काला-बाजार पर हमला जानकर मध्यम वर्ग राहत की उम्मीद कर रहा है, गरीब इसे अच्छे दिन का संदेशवाहक मान रहा है। खिलाफत करने वाले वे हैं जो आज की स्थिति में राजा थे, और कमाई चल रही थी। उन्हें डर है कि धक्का लगेगा। खिलाफत करने वाला एक ग्रूप वह भी है जो समझता है की इस तरीके से काला-बाजार और काले धन को समाप्त करने की कोशिश अपर्याप्त और परेशान करने वाला है। जो भी हो मंथन है। अब चालू हो गया है, तो विष और अमृत दोनों निकलेगा।
कहीं विज्ञापन में पढ़ा था की यह एक उत्सव है, 50 दिनों का। मुझे किसी के लिए उत्सव तो दिखाई नहीं देता। हाँ जनता संस्थान के साथ है। उस गरीब को अच्छे दिन क्या होते हैं, यह तो पता नहीं है। लेकिन उसे विश्वास है कि जिसे चुनकर भेजा उसे मालूम है कि गरीब के लिए अच्छा दिन क्या अर्थ रखता है। उसकी कोशिश उसी दिन को लाने की है। इसलिए उसकी किसी भी कोशिश को कामयाब होने की कामना रखता है, और उसके लिए कष्ट भी सहता है। आम आदमी का यही समर्थन जनतंत्र में सत्ताधारी के लिए वरदान है, दुष्टों का नाश करने के लिए। लेकिन जिसे यह वरदान मिला है, उसके हांथ बंधे हैं, उस विश्वास से। वह इस लड़ाई में मैदान छोड़ने के लिए स्वतंत्र नहीं है, चाहे वह फकीर ही क्यों न हो।

 

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