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Vela Writes

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पार्टी या नेता

सही मायने में ऐसा कोई नेता नहीं दिखता, जो देशहित की बात करते हुये पार्टी के मत का ध्यान भी न करता हो। अभी तो नेता, पार्टी और सरकार, अगर भाग्यवश बन गयी तो, एक ही हो गये हैं। केवल पदों पर कठपुतलियों को सजा दिया जाता है।
दूसरी ओर ऐसा भी कोई नेता दिख नहीं रहा है जो सरकार को उसकी गलतियॉं बताये या बताने पर भी न मानने पर बहुत बडा जनमत तैयार करने का माद्दा रखता हो।

सही मायने में नेताओं ने अपनी क्रेडिबिलिटी खो दी है, जनता की उम्मीद समाप्त हो चुकी है। अब तो केवल जातवाद , ग्रुप, एरिया के नाते थोडा साख बची है।
किसी नाकामी से उपजे आक्रोश को भुनाने की कोशिश भी देशहित नही कही जा सकती, जब तक की निर्णय ही गलत न हो।
अतएव जनता की सावधानी जनता के स्तर पर होने से बहुत अच्छा हो सकता है, क्यों कि नेताओं के स्तर पर आशाएं नही रहीं।

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